大富豪国际网址

BiharonWeb Logo Upcoming Elections
Information on various aspects of history, geography, states, districts & personalities of India
||World Breastfeeding Week - 1st August to 7th August||
Bezawada Gopala Reddy was born today||David Baldacci was born today||Gopinath Bordoloi had died today.||Kesab Chandra Gogoi had died today.||
Home >> News >> जब हड़ताल का कहर मरीजों पर टूटे तो क्यों कहें डॉक्टरों को भगवान

जब हड़ताल का कहर मरीजों पर टूटे तो क्यों कहें डॉक्टरों को भगवान

image
Posted on: 23 Nov, 2018 Tags  

BiharonWeb: 23 Nov, 2018,

डॉक्टरों की छवि भगवान के बजाय राक्षस की क्यों बन रही है ?

किसी भी शहर का अखबार उठा लीजिए, उसमें डॉक्टरों व मरीजों के तीमारदारों के बीच झगड़े की खबरें अक्सर दिख ही जाती हैं। लोग अक्सर डॉक्टरों के खिलाफ बेहद आक्रोश में दिखाई देते हैं और उन्हें जीवनदाता के बजाय जीवन छीन लेने वाला कहने लगते हैं। कुछ लोग तो घटना से इतने दुखी और क्षुब्ध हो जाते हैं कि डॉक्टरों को कोसने लगते हैं और उन्हें राक्षस की संज्ञा दे देते हैं। इसके कई उदाहरण हैं। के एक मंत्री ने डॉक्टरों को राक्षस करार दिया था तो बिहार में मुख्यमंत्री रहते जीतनराम मांझी ने वंचितों का हक मारने पर डॉक्टरों के हाथ काट लेने की बात कह डाली थी। बेशक मंत्री और मुख्यमंत्री की टिप्पणी गलत है। बेशक मरीजों के तीमारदारों का गुस्सा गलत हो सकता है, लेकिन क्या डॉक्टरों ने कभी सोंचा है कि आखिर वे ही सबके निशाने पर क्यों रहते हैं ? क्यों उनके बारे में गलत धारणा बनती जा रही है ? क्यों एकदम से लोग उनके खिलाफ भड़क जाते हैं ? क्यों वे अक्सर भगवान के बजाय राक्षस कहे जा रहे हैं ? ताजा मामला बिहार के भोजपुर जिले के आरा शहर का है। भोजपुर डीएम के गार्ड व डॉक्टरों के बीच नोकझोंक के मामले को लेकर बात इतनी बिगड़ गयी की आरा समेत पूरे बिहार के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की ओपीडी सेवा ठप करा दी गयी। बिहार के भोजपुर जिले में डॉक्टरों और डीएम के बीच चल रही लड़ाई के 72 घंटे से अधिक बीत गए हैं। लेकिन, मामला सुलझने की बजाय और उलझता ही जा रहा है। भोजपुर जिले के सरकारी अस्पताल के साथ ही कई निजी क्लिनिक भी बंद हो गए हैं। आइएमए और भासा की आकस्मिक बैठक के बाद निजी क्लिनिकों को भी बंद करने का एेलान किया गया है। अस्पतालों में ओपीडी बंद करने का सबसे अधिक खामियाजा जिले के मरीजों को भुगतना पड़ा है। आरा में डॉक्टरों की सामूहिक हड़ताल का कहर मरीजों पर टूटा है, जिसमें मरीज को इलाज के अभाव में जान तक गंवानी पड़ी है। इसे देखते हुए सदर अस्पताल, आरा में जिला प्रशासन के द्वारा आयुष डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गयी है। वहीं, आरा के कई छात्र संगठन भोजपुर डीएम के समर्थन में उतर गए हैं। लेकिन, यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्य में स्वास्थ्य महकमे में इतना बड़ा बवाल होने के बाद भी राज्य सरकार या स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मामले को सुलझाने के लिए अबतक कोई पहल नहीं की गई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि डॉक्टरों के बीच बहुत एकता है। वे खुद में कोई दोष नहीं मानते और तुरंत चिकित्सा सेवा ठप कर हड़ताल पर चले जाते हैं। जबकि, एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों को जीवनदाता मानते हुए उनसे हड़ताल नहीं करने का अनुरोध भी किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण के मद्देनजर डॉक्टरों को समझ जाना चाहिए कि उनका पेशा कितना खास है। लोग उन्हें भगवान की तरह मानते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि अगर वे समस्या पर गंभीरता से विचार नहीं करेंगे तो लोगों में खुद के प्रति बढ़ते गुस्से को कम नहीं कर पाएंगे।

यह था पूरा मामला

सदर अस्पताल, आरा में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हाजिरी बनाने के विवाद ने मंगलवार को काफी तूल पकड़ लिया। इमरजेंसी वार्ड में तैनात डॉक्टर टीए अंसारी ने डीएम की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में जाने से इनकार किया, तो डीएम ने गार्ड भेज उन्हें जबरन बुलवाया। इस दौरान डॉक्टरों व डीएम के गार्डों के बीच काफी नोकझोंक भी हुई। डॉक्टरों ने डीएम आवास पर ले जाकर मारपीट करने का भी आरोप लगाया है। डॉक्टरों के अनुसार डॉ टीए अंसारी के अलावा भासा के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार व सचिव डा. नरेश सिंह के साथ मारपीट की गयी है। इसके बाद डॉक्टर भड़क उठे और हड़ताल पर चले गये। इससे अस्पताल की इमरजेंसी व आउटडोर सेवा पूरी तरह ठप हो गयी। इमरजेंसी व आउटडोर सेवा ठप होने से मरीज परेशान हो उठे और सदर अस्पताल में अफरातफरी मच गयी। मरीज इलाज के लिए भटकने लगे। अंतत: इलाज कराने आये मरीजों को बैरंग वापस लौटना पड़ा। जानकारी के अनुसार डीएम संजीव कुमार मंगलवार को डॉक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर रहे थे। इस दौरान दोपहर करीब 2 बजे डीएम ने डॉक्टर टीए अंसारी को कॉल की। तब डॉक्टर ने इमरजेंसी वार्ड में होने की बात कहते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में जाने से इनकार कर दिया। इसके बाद डीएम ने गार्डों को भेजकर डॉक्टर को जबरन अपने आवास पर बुला लिया। इधर, डॉक्टरों के समर्थन में भासा व आईएमए भी उतर गया है। इसके बाद देर शाम हुई डॉक्टरों की बैठक में आईएमए के जिलाध्यक्ष शामिल हुए। बैठक में सदर अस्पताल समेत पूरे भोजपुर के सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों ने बुधवार को ओपीडी व इमरजेंसी सेवा ठप करने का निर्णय लिया। वहीं, गुरुवार को सरकारी अस्पतलों के अलावा निजी क्लीनिकों को भी ठप करने का निर्णय डॉक्टरों ने लिया। डीएम के अंगरक्षकों द्वारा डाक्टरों से दुर्व्यवहार व मारपीट किए जाने को लेकर मंगलवार की शाम सदर अस्पताल के ओपीडी और इमरजेंसी सेवा में अचानक हड़ताल किए जाने के कारण नवजात समेत दो लोगों की जान भी चली गई । करीब तीन सौ से अधिक मरीजों को बिना इलाज कराए ही वापस लौटना पड़ा। जिसके चलते मरीजों व उनके परिजनों में काफी देर अफरातफरी मची रही।

 

यह भी पढ़ें-

क्यों बिगड़ रही है डॉक्टरों की छवि

अगर हम प्राइवेट सैक्टर की बात करें तो वहां डॉक्टरों ने अनाप-शनाप फीस तय कर रखी है। फीस का कोई मानक तय नहीं है। आज एक डॉक्टर सलाह देने के 200 रुपये ले रहा है तो दूसरा 500 से 800 रुपये तक लेता है। सामान्य जुकाम-खांसी-बुखार में भी ज्यादातर डॉक्टरों द्वारा 400-500 रुपये लेने पर अनेक लोग इन रोगों की स्थिति में डॉक्टरों के पास जाने से कतराने लगे हैं। इसके बजाय वे या तो सीधे मेडिकल स्टोर से दवा ले लेते हैं या कोई देसी इलाज ढूंढते हैं। आज ओवर द काउंटर (OTP medicines) दवाओं की बिक्री इसीलिए आसमान छू रही है, क्योंकि साधारण सलाह के लिए भी डॉक्टर अनाप-शनाप फीस लेते हैं। वहीं, अनेक डॉक्टर अपनी 500-600 रुपये की फीस भी अमूमन केवल तीन दिन के लिए रखते हैं। तीन दिन बाद मरीज दोबारा आता है तो उसका नया पर्चा बनता है। भारी फीस लेकर भी बहुत से डॉक्टर मरीजों से सीधे मुंह बात नहीं करते। डॉक्टर के कमरे में एक मरीज की बात सुनने से पहले ही दूसरे मरीजों को बुला लिया जाता है। कई डॉक्टर तो तीन-चार मरीजों को एक साथ देखते हैं। मरीज या उसके परिजन के कुछ पूछने पर डॉक्टर भड़क उठते हैं, जबकि पूरी फीस देने के बाद मरीज का यह हक बनता है कि वह अपने रोग के बारे में तमाम जिज्ञासाओं को डॉक्टर के जरिये शांत कर सके। मोटी फीस लेने के बावजूद कई डॉक्टर मरीजों को लूटने भी इंतजाम कर लेते हैं। वे जबरदस्ती ऐसे टेस्ट लिखते हैं, जिनकी कई बार कोई जरूरत ही नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विभिन्न जांच केंद्रों, पैथोलॉजी आदि से उनके पैसे बंधे होते हैं। मोटी फीस, महंगे टेस्ट लिखकर भी ज्यादातर डॉक्टरों को संतोष नहीं होता। इसके बाद वे दवाई भी महंगी लिखते हैं। उन्हें पता होता है कि इस रोग के लिए फलां कंपनी की दवाई सस्ती है, इसके बावजूद वे दूसरी कंपनी की दवाई लिखते हैं। वहीं, सरकारी अस्पतालों में तो डॉक्टरों की बेरुखी चरम सीमा पर होती है। यहां तक की मरणासन्न मरीजों के मामलों में भी उनका दिल नहीं पिघलता। किसी की मौत के बाद पोस्टमार्टम के मसले पर भी डॉक्टर बहुत ही असंवेदनशीलता दिखाते हैं। अनेक डॉक्टर झूठ बोलने से भी परहेज नहीं करते हैं। वे मरीज और उनके परिजनों से सही बात नहीं बताते। लोग कुछ पूछते हैं तो वे भड़क उठते हैं और डांट-डपट पर उतर आते हैं।
大富豪国际网址                        इन सब कारणों से समझा जा सकता है कि जब कोई केस बिगड़ता है तो अंदर ही अंदर उबल रहे मरीज या उसके परिजनों के सब्र का बांध टूट जाता है। फिर भगवान माने जाने वाले डॉक्टर में उन्हें शैतान नजर आने लगता है। दरअसल वह डॉक्टर की ऊपर बताई गई ज्यादतियों से भरा बैठा होता है। अब तक वह इसलिए चुप रहता है कि अभी तक डॉक्टर उसे पैसे से ही लूट रहा होता है। वह इस लूट को सह लेता है, इस उम्मीद में कि हो सकता है कि वह या उसका परिजन स्वस्थ ही हो जाए। लेकिन, जब ऐसा नहीं होता तो वह बिखर जाता है। तब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और वह बेकाबू हो जाता है।

Edited by Ashutosh

Copyright © 2020 lcyz186.cn
Powerd By