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बार-बार धोखा खाकर भी जाति-धर्म के नाम पर देते हैं वोट

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Posted on: 05 Oct, 2018 Tags  

BiharonWeb: 05 Oct, 2018,

जाति की राजनीति कर नेता हो गए अरबपति, तंगहाली में जी रहे मतदाता

बिहार 大富豪国际网址में अधिकांश राजनीतिक दलों की राजनीति, जाति-बिरादरी, वर्ग, क्षेत्र और परिवारवाद के इर्द-गिर्द ही घूमती है। इन्हीं आधारों पर प्रत्याशियों का चयन किया जाता है। धन, बाहुबल और पार्टी नेताओं के साथ नजदीकियां ही प्रत्याशी बनने की योग्यताएं बन गई हैं। राजनीति में अपराध, भ्रष्टाचार, जातिवाद, तुष्टीकरण जैसी प्रतिभा अधिक प्रभावशाली है। गांवों में जेब में तमंचा खोसे, बाइक पर चश्मा लगाए सफेद कपड़े में बैठे युवक सिर्फ नेताओं की दलाली या किसी बाहुबली के पीछे घूमते रहने में अपनी शान समझते हैं और छोटे-छोटे कानून नियमों के उल्लंघन में ही बड़ी बहादुरी मानते हैं। यहां पार्टियों का झंडा लगाए गाड़ियों में अपराधियों का घूमना आम है। चुनाव में जनता अपनी ही जाति और अपराध के सरगनाओं के गणित पर मूल्य तय करती है। इसका जो सामाजिक और राजनीतिक चेहरा उभरता है, उस पर सिफारिश, पहचान, अपराध, बाहुबली और जाति आधारित राजनीति की मुहर लगी रहती है। जातियों और उपजातियों में बंटे चुनावी समीकरण के अलावा पैसा, शोहरत और अपराध चुनाव में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जातियां और बाहुबल का जटिल गणित बिहार राजनीति का अहम हिस्सा हो गया है। विडम्बना यह है कि इसे एक तरह से सामाजिक मान्यता जैसी मिल गयी है जो अत्यन्त घातक है। विकास , उद्योग, आर्थिक प्रगति व बुनियादी सुविधाओं पर शायद ही चर्चा हो रही हो। कभी अगड़ा-पिछड़ा का मुद्दा चुनाव की लहर बदलता है कभी आरक्षण का। नेताओं के बेटे, बेटी, पत्नी, बहु, भाई और करीबी रिश्तेदारों का सीटों पर कब्ज़ा हो रहा है। चुनावी सभा में जनता अपनी गरीबी के हल सुनने नहीं जाती, बल्कि नौटंकी के ठुमके देखने जाती है। बिजली नहीं आती, अस्पतालों में दवाईयां गायब हैं, स्कूलों की छतें गिरी हुई हैं, किसान बेहाल है, उद्योग दूसरे राज्यों में फलफूल रहे हैं, लेकिन बिहार में नदारद हैं। सड़कों पर सुरक्षा नहीं है, लोग दूसरे राज्यों में भाग रहे हैं। लेकिन, चुनाव के नतीजे हमेशा कुर्सियों के गणित , गठबंधन की सियासी चालें, जाति और साम्प्रदायिकता, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, सब्सिडी और क्षेत्रीयवाद पर टिका रहा है। रैलियों और सभाओं में अपनी गर्जन से शीर्ष नेताओं को समर्थन देने वाला, अपने भूमि से उन्हें सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर लाने वाला यह बिहार का व्यक्ति रोजीरोटी के लिए शहर निकल पड़ता है। कीड़े-मकोड़े की भांति दौड़ते-चढ़ते, गिरते-पड़ते रोज जिंदगी में संघर्ष करता है, ताकि स्वंय का पेट ही नहीं, गांव में भी गोरु, मेहरारू और बचवा को भी खिला सके, माता-पिता की दवा भी करा सके। देश के विकास में सहयोग देने वाला अपने गांव की छप्पर बनाने में ही शहरो में घिसता रहता है। लेकिन, इतनी समस्याओं के बावजूद बदलाव की बात नहीं होगी और विकास, सुशासन, कानून व्यवस्था जैसे नारों के पीछे चुनाव में जातीय प्रतिनिधित्व के माध्यम से जातियों और परिवारवाद को जोड़ने का खेल चलता रहेगा।

परिवारवाद व जातिवाद की राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण

जनता परिवारवाद की नौटंकी और जातिवाद के गणित में विवश ,असहाय , बेबस , लाचार , खामोश और निष्क्रिय क्यों है ? हमने अपने लोगों को अपने ही घर से रोजी-रोटी व सुरक्षा के अभाव में पलायन करने दिया। क्या हमें विकास, उन्नति, रोजगार, अच्छा क़ानून व्यवस्था नहीं चाहिए ? क्या हमें 24 घंटे बिजली नहीं मिलनी चाहिए ? वो दिन कब आएगा जब घर छोड़ कर बाहर जाकर नौकरी-चाकरी करने की जरुरत न पड़े ? आज एक-एक कर सभी बड़े नेताओं को जातियों तक सीमित करने का प्रचलन चल पड़ा है। कर्पूरी ठाकुर जब भूमि सुधार के लिए व्यक्ति के बजाय परिवार को इकाई बनाने की बात बिहार विधानसभा में कर रहे थे, तब वे सिर्फ अतिपिछड़ों की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि बिहार के कृषकों की बात कर रहे थे, बिहार के विकास की सबसे बड़ी बाधा को दूर करने की बात कर रहे थे। लेकिन, उन्हें भी अतिपिछड़ों का ही नेता मान लिया गया। आज की राजनीति परिणामवादी हो गई है। जयंती भी लाभ-हानि देखकर मनाई जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जिस जाति की आबादी ज्यादा है, उसके नेता को राज्य की कमान सौंप दी जाए। ऐसे समूह से नेता बनेंगे तो ऐसे नेता कभी अपनी जाति से बाहर निकल नहीं पाएंगे। हमेशा वे खास जाति के दायरे में ही सोचेंगे। उन्हें यह भय हमेशा सताता रहेगा कि अगर उन्होंने अपनी जाति को विशेष प्रमुखता नहीं दी तो जाति का समर्थन जाता रहेगा। वहीं दूसरी ओर, बड़ी आबादी वाले जाति विशेष के नेता को यह भरोसा भी रहेगा कि वे अधिक कुछ नहीं करें तो भी वे जाति के बल पर सत्ता में बने रहेंगे। उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा।

पार्टी में शीर्ष पर एक परिवार का वर्चस्व

बिहार की स्थिति रोचक है। यहां राजद में कई बड़े नेता हैं, लेकिन शीर्ष पर व केंद्र में लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार ही है। यह आश्चर्य की बात है कि पिछले 28 वर्षो में बिहार में यादवों के कोई अन्य बड़े नेता उभर नहीं सके। लालू यादव जैसे पिछड़ों के रहनुमा एक जगह आकर ठिठक गए। उनके लिए सामाजिक विकास अपने कुनबे तक सिमट गया। वे अपने परिवार को बदलने में तो सफल हो गए पर अपने समुदाय के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। दूसरे शब्दों में कहें तो उनके समुदाय के लिए राजनीति का मतलब आज भी पहले वाला ही है। नीतीश कुमार का आगमन बिहार के लिए नए युग के आगमन की तरह था। लोग देर शाम अपनी बेटियों के साथ बाजार जा सकते थे। सड़कें बन रही थीं और विकास बहस का मुद्दा बन रहा था। लेकिन जदयू के केंद्र में भी केवल नीतीश कुमार ही हैं। भाजपा की स्थिति तो और भी आश्चर्यचकित करने वाली है। यहां सिर्फ और अमित शाह ही दिखते हैं। यहां तक की राज्य के नेतृत्व का भी स्थान कहीं नहीं दिखता। विधानसभा चुनाव प्रचार सिर्फ दो व्यक्तियों पर केंद्रित होकर रह गया है। राज्य के चुनाव में भी भाजपा मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के बतौर कोई चेहरा सामने नहीं ला सकी। वहीं, कांग्रेस ने बार- बार यह साबित किया है कि उसका चरित्र परिवार आधारित वंशानुगत राजतांत्रिक है। गांधी-नेहरू परिवार के बाहर कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं। यह पार्टी तब तक ही अखंडित रह सकती है, जब तक सर्वोच्च पद पर इस परिवार का व्यक्ति हो। परिवार के बाहर का कोई भी कांग्रेस का सर्वमान्य नेता नहीं हो सकता। कांग्रेस ने पार्टी के भीतर भी वफादार कांग्रेसी नेताओं के वंशजों को उचित स्थान दिया। लेकिन एक साथ एक ही परिवार के कई लोग सत्ता में काबिज नहीं हो पाए, कुनबा नहीं बन पाया।

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लोकतंत्र में कुनबावाद हावी

बिहार को इस दुश्चक्र से निकालने के लिए जरूरी है कि वहां शहरीकरण हो, उद्योग-धंधों का विकास हो, ताकि सामाजिक मूल्य बदलें। राज्य में वित्तीय पूंजी की अनुपस्थिति के कारण सामाजिक हैसियत का पुराना मानदंड आज भी कायम है। यह स्थिति तभी बदलेगी जब विकास को एजेंडा बनाया जाए। लेकिन, विकास भी तभी होगा जब राज्य में कानून-व्यवस्था दुरुस्त रहे। कुनबे की राजनीति को लोगों ने सहजता से लेना भी शुरू कर दिया है, मानो वे इसके अभ्यस्त हो चले हैं। आखिर लोकतंत्र में कुनबावाद कब तक हावी रहेगा और इससे कभी निजात मिलेगी भी या नहीं ? क्या लोकतंत्र जमीनी संघर्षों, सामाजिक सरोकारों और नेतृत्व कौशल को परखने के बजाय परिवार केंद्रित मोहवादी राजनीति का शिकार हो जाएगा ? आम मतदाता यह भी नहीं देखते कि उनकी जाति या समुदाय से लगाव अथवा उनकी भलाई के दावे करने वाले राजनेता वास्तव में उनसे कितना लगाव रखते हैं। ऐसा उन्होंने क्या किया है जो उन्हें हम अपनी जाति या संप्रदाय का हितैषी मान लें ? सरकारें जातियों के कल्याण के लिए अपनी तिजोरियां खोल देने के दावे करती हैं, लेकिन पिछले छह दशकों से अधिक समय में उनकी स्थिति कुछ खास नहीं बदल पाई है। ऐसी क्या वजहें हैं जो उन्हें आज भी हर मामले में मदद की दरकार है ? जातियों के नाम पर कुछ राजनेता अरबपति हो गए, लेकिन उन्हीं जातियों के लाखों आम नागरिक तंगहाली की जिंदगी जी रहे हैं और ऐसा किसी एक जाति में नहीं है। हकीकत यह है कि किसी भी जाति के कुछ मुट्ठी भर लोग ही किसी योजना का लाभ उठा पाए हैं और इनमें अधिकतर वही लोग हैं जो किसी न किसी तरह सत्तातंत्र के करीब हैं। जो उससे दूर हैं वे दूर ही रह जाते हैं।

जातिगत सोंच से बाहर आकर विकास को देना होगा तरजीह

हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब मतदाताओं ने जातिगत सोंच के दायरे से अलग हटकर मतदान किया है। खासकर युवा पीढ़ी के अधिकतर शिक्षित लोग इस मुद्दे पर अलग ढंग से सोंचते हैं। वह अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों को अधिक तरजीह देते हैं। पार्टियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी अब पहले जैसी नहीं रह गई है। इसके मूल में केवल शिक्षा का प्रसार और समय के साथ दुनिया में हो रहे परिवर्तनों का उन पर पड़ने वाला प्रभाव ही नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चल रहे राजनीतिक प्रयोगों के प्रति उनके अपने अनुभव भी हैं। वहीं, बिहार में ऐसे मतदाताओं की भी कमी नहीं है जो बहुत बार धोखा खाने के बावजूद जाति-धर्म के नाम पर ही वोट देते हैं। ऐसा वे कभी अपने निजी पूर्वाग्रह के कारण करते हैं तो कभी भय के कारण। सच तो यह है कि आम आदमी से जुड़े इन सवालों से उन्हें खुद ही जूझना होगा और वह उनसे जूझ तभी सकेंगे, जब राजनेताओं के बहकावे में न आए। क्षेत्र के विकास अथवा जाति या धर्म विशेष का हितैषी होने का उनका दावा कितना सही है और कितना खोखला, यह निर्णय उसे स्वयं अपने विवेक से ही करना होगा। जब तक हम जाति-धर्म जैसी संकीर्णताओं में उलझे रहेंगे तब तक अपने असली मुद्दों पर नहीं सोच सकेंगे। इसलिए यह केवल जरूरी नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि हम इस सोंच से उबरें और अपने ही मुद्दों के आधार पर निर्णय लेना सीखें।

Edited by Ashutosh

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