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बिहार के सरकारी स्कूलों में बहाल गुरूजी नाकाबिल

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Posted on: 29 Aug, 2018 Tags  

BiharonWeb: 29 Aug, 2018,

शिक्षा विभाग के जांच में खुली शिक्षकों की पोल

बिहार में शिक्षा का जो हाल हुआ है वह किसी से छिपा नहीं है, पूरे देश में जगहंसाई हुई, दुनिया भर के लोगों को पता चला कि सत्ता का इस्तेमाल कर किस-किस तरीके से टॉपर घोटाला किया जा सकता है। बिहार में अनगिनत सरकारी स्कूल हैं। शिक्षक भी उतने ही हैं। लेकिन शायद ही कोई ऐसा सरकारी स्कूल हो जहां शिक्षा की ज्योति जलती है। बिहार में शिक्षा बदहाल है, सरकारी स्कूल जर्जर हैं, शिक्षक समय से नहीं आते, जो आते हैं वे भी सही ढंग से नहीं पढ़ाते हैं। सरकार की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि शिक्षक रसोईया बन कर रह गए हैं। वे बच्चों को पढ़ाने से अधिक खिचड़ी पकाने और नमक -तेल के हिसाब में लगे रहते हैं और न ही उनके आने का हिसाब है न जाने का। बच्चे खिचड़ी खाते हैं और घर चले जाते हैं। सामाजिक सरोकार रखने वाले भी शायद इस हकीकत से पर्दा नहीं उठा पाते। एक शब्द में कहें तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। मोटे वेतन पाने वाले शिक्षकों ने कभी भी खुद को उस आधुनिक शिक्षा प्रणाली की ओर नहीं ढ़ाला जो आज की जरूरत है। सरकार ने ऐसे शिक्षकों को पढ़ाने का मौका भी नहीं दिया। वेतन दिया, पर स्कूलों को अनुशासन नहीं दिया। सिर्फ स्कूल पहुंच कर हाजिरी बनाने से काम नहीं चलेगा। स्कूल आए हैं तो बच्चों को पढ़ाना भी होगा। वेतन बच्चों को पढ़ाने के एवज में मिलता है और यह कार्य शिक्षकों को प्राथमिकता के आधार पर करना होगा। सरकार के पास ऐसी शिकायतें आ रही हैं कि शिक्षक स्कूल नहीं आते, लेकिन बाद में उनकी हाजिरी जरूर बन जाती है। एक तो पहले से ही सरकारी स्कूलों में नियमित क्लास नहीं होती है, ऊपर से बिहार के हाईस्कूलों मे बहाल कई गुरुजी पढ़ाने के काबिल भी नहीं हैं। ये कोई आरोप नहीं, बल्कि सरकार खुद मान रही है। इन शिक्षकों की योग्यता इतनी नहीं है कि वे छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकें। जब शिक्षा विभाग ने जांच करायी तो ऐसे शिक्षकों की पोल-पट्टी खुल गयी।

114 स्कूलों में 77 शिक्षक पढ़ाने योग्य नहीं

बिहार के विभिन्न जिलों के अलग-अलग प्लस टू और हाई स्कूल के निरीक्षण में यह खुलासा हुआ है कि यहां 73 शिक्षक पढ़ाने योग्य नहीं है। शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव के आदेश पर कराए गए 237 स्कूलों के निरीक्षण में से 114 स्कूलों की रिपोर्ट मुख्यालय को मिल गई है, जिसमें यह जानकारी सामने आई है। 114 स्कूलों के लिए 1515 शिक्षकों के पद सृजित हैं, जिनमें निरीक्षण के दौरान 1261 शिक्षक उपस्थित पाए गए। वहीं, 14 शिक्षक बगैर सूचना के स्कूलों से गैरहाजिर मिले। शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने पाया कि 111 स्कूलों में समय पर घंटी लगी, जबकि तीन स्कूलों में घंटी थोड़ी विलंब से लगाई गई। इन 114 स्कूलों में से किसी में भी निर्देश के बाद भी प्रार्थना का सत्र आयोजित नहीं किया गया। निरीक्षण के दौरान 1184 शिक्षक गुणवत्ता की कसौटी पर सही पाए गए, जबकि 77 शिक्षकों के बारे में यह जानकारी सामने आई कि इन्हें ठीक से पढ़ाना नहीं आता है। विभाग ने इन शिक्षकों के कार्य को असंतोषप्रद माना है। सूत्रों ने बताया कि शेष जिलों के निरीक्षण की रिपोर्ट कंपाइल होने के बाद अग्रेतर कार्रवाई के आदेश जारी किए जाएंगे। शिक्षा विभाग के आदेश पर इन स्कूलों में कई बिन्दुओं पर जांच की गयी थी। इसके तहत यह भी जांच करना था कि स्कूलों में तैनात शिक्षकों की योग्यता क्वालिटी एजुकेशन देने के काबिल है या नहीं। जांच में पाया गया कि 14 जिलों 77 शिक्षक ऐसे हैं जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम नहीं हैं। यानी जांच में ऐसे शिक्षकों को नाकाबिल पाया गया। जांच रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अधिक नाकाबिल शिक्षक पूर्वी चम्पारण जिले में हैं। इस जिले में 14 शिक्षकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में अयोग्य पाया गया। इसके बाद भागलपुर 大富豪国际网址जिले का नम्बर आता है। यहां ऐसे शिक्षकों की संख्या 12 है। जब शिक्षक की योग्यता ही सवालों के घेरे में होगी तो पढ़ाई बेहतर कैसे हो सकती है ? हाई स्कूल, उच्च शिक्षा में जाने का सबसे अहम पड़ाव है। अगर यहां सिर्फ बस्ता ढ़ोने वाली पढ़ाई होगी तो छात्र आगे चल कर क्या करेंगे ? सरकार पैसा तो खर्च कर रही है, लेकिन उसका मकसद पूरा नहीं हो रहा। अब देखना है कि शिक्षा विभाग इस रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई करता है ?

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आगे भी होगा निरीक्षण

सरकारी स्कूलों में निरीक्षण की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव के आदेश के बाद फिर ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक स्कूलों के औचक निरीक्षण का फैसला हुआ है। आदेश के मुताबिक सभी 38 जिलों में से प्रत्येक जिले में अधिकारी औसतन चार-चार स्कूल का निरीक्षण करेंगे। जांच में लगाए गए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि निरीक्षण के बाद स्कूलों से जुड़ी रिपोर्ट हर हाल में शाम पांच बजे तक मुख्यालय को मुहैया करा दी जाए।
राज्य में शिक्षा के स्तर को लेकर समय-समय पर सरकार की आलोचना होती रहती है। शिक्षकों को पढ़ाने के तौर-तरीकों में बदलाव करने की जरूरत है। पाठ्यपुस्तकों को बोझ की तरह विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाना चाहिए। पढ़ाने के पारंपरिक तौर-तरीकों के बजाय इस तरह से पढ़ाना चाहिए, कि वह रुचिकर हो और विद्यार्थियों का विषय में मन लगे। यह तभी संभव है, जब हर शिक्षक विद्यार्थियों के बारे में सोंचेगा। छोटे बच्चे से तो हम यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपने आप पढ़ेगा। उसे तो शिक्षक या मां-बाप को ही पढ़ाना पड़ेगा। यदि मां-बाप अनपढ़ हैं तो पढ़ाने-लिखाने की पूरी जिम्मेदारी शिक्षक पर ही आ जाती है। यानी बच्चा यदि नहीं सीख रहा तो यह इसलिए हो रहा है कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहा।

Edited by Ashutosh

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