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एक मिशन नहीं, बल्कि प्रोफेशन और बिजनेस बन कर रह गयी पत्रकारिता

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Posted on: 21 Aug, 2018 Tags  

BiharonWeb: 21 Aug, 2018,

दलाल पत्रकार ट्रक से अवैध वसूली करने वाले सिपाहियों को करते हैं टारगेट, डीएम-एसपी के दफ्तर में पहुंच बन जाते हैं भीगी बिल्ली

बिहार में नेशनल, रीज़नल व लोकल कुल मिलाकर सैंकड़ों अखबार व न्यूज़ चैनल संचालित हैं। इनमें कार्यरत पत्रकारों का यह दायित्व है कि वे लोगों को सही खबरों से अवगत कराएं और उनमें लोकतंत्र की आस्था को मजबूत करें। लेकिन, ऐसा नहीं किया जा रहा है। वर्तमान समय में पत्रकारिता बुरे दौर से गुजर रही है। यह अब मिशन नहीं, बल्कि एक प्रोफेशन और बिजनेस बन कर रह गयी है। वहीं, आज वर्चस्व या पैसों के बल पर पत्रकारों से मनमाने तरीके से खबर लिखवाने या प्रसारित करवाने का दौर चल रहा है और पत्रकार भी पैसे मिलने वाली ख़बरों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। कुछ दलाल पत्रकार सामाजिक मुद्दों को छोड़कर, नेताओं के यहां दरबार लगाते हैं। ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर दिखाना ही इनका पेशा बन गया है। ये ट्रकों आदि वाहनों से अवैध वसूली करने वाले सिपाहियों को तो रह-रहकर टारगेट करते हैं, लेकिन डीएम-एसपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भीगी बिल्ली बने रहते हैं। वहां से निकलकर खबर के नाम पर उनके हाथ में होती है बस एक प्रेस विज्ञप्ति। जबकि जिले के विभागों में हो रहे घोटालों, अनियमितताओं के बारे में अधिकारी से पूछने के लिए इनके पास एक प्रश्न नहीं होता है। पुलिस थानों में जाकर ये चमचागिरी तो करते ही हैं, लेकिन इनका अधिकांश समय पैसा या विज्ञापन देने वाले स्कूलों, कोचिंग संस्थानों, होटल, दुकानों या अन्य संस्थानों में बीतता है। ये इतने स्वार्थी होते हैं कि 6 माह से वेतन नहीं मिलने के विरोध में धरने पर बैठे शिक्षक या स्वास्थ्यकर्मियों से खबर के नाम पर पैसे ऐठते हैं। धरनाकर्मी भी अपनी मांग ऊपर पहुंचाने की मजबूरी में पैसा देते हैं। वहीं, कुछ संगठनों के अध्यक्ष या नेताओं को अपनी फोटो के साथ वक्तव्य छपवाने के शौक ने भी दलाल पत्रकारों की लालच को बढ़ावा दिया है। ऐसा नहीं है कि सभी पत्रकार स्वार्थी, लालची या बिकाऊ हैं। कुछ तो बड़े रूमानी अंदाज के साथ पत्रकारिता जगत में प्रवेश करते हैं। लेकिन आज का दौर ही ऐसा हो गया है कि अधिक समय तक वे नैतिकता का निर्वहन नहीं कर पाते हैं या उन्हें ऐसा करने नहीं दिया जाता है। उन्हें अपने ही संस्थान में ऊपर से दबाने की कोशिश की जाती है। आगे चलकर वे या तो धारा के साथ बहना सीख लेते हैं, या वहां से खुद निकल जाते हैं। वर्तमान समय में बहुत कम ही पत्रकार ऐसे हैं जो अपनी बेदाग़ छवि के साथ जैसे-तैसे नैतिकता का निर्वहन कर रहे हैं।

पत्रकार बन गए मीडियाकर्मी

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जब न्यायपालिका को छोड़कर लोकतंत्र के बाकी स्तंभ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की समस्याओं से जूझ रहे हों, तो ऐसे समय में पत्रकारिता की सामाजिक जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। लेकिन, दुखद बात तो यह है कि अब तो समाचारों की विश्वसनीयता पर भी संदेह होने लगा है। वैसे तो हर कोई अखबार में काम तो करना चाहता है, लेकिन उसके पीछे उस व्यक्ति के कई कारण होते हैं। चंद रुपयों पर अपनी जमीर बेचना ही अब कुछ के लिए पत्रकारिता बन गयी है। ताज्जुब तो इस बात का है कि दलाल पत्रकार का साथ अखबार मालिक व मैनेजमेंट भी सिर्फ इसलिए देते हैं कि वह उनकी भी जेबे गर्म करता है। पुराने दौर में पत्रकारों का अख़बार के नफ़ा-नुक़सान के बारे में सोंचना भी अनैतिक था, लेकिन जब नौकरियां ठेके पर दी जाने लगीं तो न्यूज़रूम पर बाज़ार का क़ब्ज़ा हो गया। किसी ज़माने में दिग्गज बुद्धिजीवी, साहित्यकार और अर्थशास्त्री अख़बारों के संपादक होते थे। अब अख़बार के मालिक वफ़ादारों को संपादक बनाकर उन्हें मुनाफ़े की ज़िम्मेदारी देने लगे हैं। अख़बार के पन्नों में ख़बर से अधिक विज्ञापन को प्राथमिकता मिलने लगी है। विज्ञापन की ललक के चलते कॉरपोरेट सेक्टर की धांधलेबाज़ी की ख़बरें कम होती गईं। संपादक की पगार से अधिक मार्केटिंग और सेल्स मैनेजरों की पगार होने लगी। एक वक़्त था जब अख़बार का सालाना ख़र्चा कमोबेश बिक्री और विज्ञापन से निकल ही आता था, लेकिन टीवी चैनल लगाने और चलाने के विशाल ख़र्चे विज्ञापन से पूरे नहीं हो सकते थे। ऐसे में बड़े उद्योगपतियों ने धंधे में पूंजी लगाना शुरू किया। इस तरह औद्योगिक व्यवस्था का प्यादा बन गए पत्रकार से निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की अपेक्षा बेतुकी और अनुचित है। वो पत्रकार नहीं "मीडियाकर्मी" है। उसका काम अख़बार की बिक्री और न्यूज़ चैनल की रेटिंग बढ़ाना है।

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राजनीतिक दलों से डील कर छपते हैं समाचार

आज की मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। मीडिया के काफी बड़े हिस्से ने राजनीतिक पार्टियों से हाथ मिला लिया है। पत्रकारिता एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है। आज सस्ती टीआरपी की होड़ लगी है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है जब अखबारों के मालिक ही राजनीतिक दलों से डील कर पैसे लेकर उनके पक्ष में समाचार छापते हैं, तब फिर मातहत अधिकारी और कर्मी भी तो यही करेंगे। लोग पत्रकार क्यों बनते हैं- जन सेवा के लिए या फिर जैसे-तैसे पैसा कमाने के लिए ? माना, अब पत्रकारिता अब मिशन नहीं रहा, लेकिन इसको मिशन बनाया जा सकता है। तेज सफर में पत्रकारों को पत्रकारिता जगत के लिए शहीद भी होना पड़ा, लेकिन इन कलम के रखवालों ने अपनी कलम की रोशनी को कम नहीं होने दिया और भ्रष्टाचार का विनाश किया। लेकिन समय बदलते ही कलम की रोशनी पर भी तेज आंच आयी जो आज भी बदस्तूर जारी है। पत्रकारिता जगत में पत्रकारों को हर पल अपने जान-माल का खतरा भी रहा है, लेकिन कलम के रखवालों ने अपनी कलम की रोशनी को यूं ही व्यर्थ नहीं होने दिया। अपनी कलम की रोशनी को पूरे पत्रकारिता जगत पर बिखेर कर रोशन कर दिया। पत्रकार एक ऐसा शब्द है जिसकी रक्षा करना हर कलम के जादूगर का फर्ज है और यही सोंच लेकर बहुत से कलम के हुनरदारों ने पत्रकारिता जगत में धूम-धड़ाके से प्रवेश किया। मगर समाज ने उन्हें उनका फर्ज भुलाकर अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश शुरू कर दी। देश व राज्य के गद्दारों, भ्रष्टाचारियों, अवैध धंधे करने वालों ने पत्रकारों को अपनी मुट्ठी में कैद करके पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाकर कलम के हुनर को दबाने की कोशिश की है और अब उनका प्रयास और तेज है। आज इस बात से हरगिज इंकार नहीं किया जा सकता है कि पहले अख़बार छप कर बिकती थीं, अब बिक कर छपती हैं।

Edited by Ashutosh
 

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