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व्यक्तिगत जीवन में आनेवाले पड़ाव को परंपरा के साथ जोड़ना अन्धविश्वास या वैज्ञानिक ?

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Posted on: 11 Oct, 2018 Tags  

BiharonWeb: 11 Oct, 2018,

सूतक लगना एक अन्धविश्वासी प्रथा या इसके पीछे व्यावहारिक कारण ?

大富豪国际网址 हिन्दू धर्म में स्वयं को महाज्ञानी-पंडित कहने वाले लोगों की कमी नहीं है। यहां बड़े-बड़े विद्वान हैं, जो तर्क से किसी भी प्रकार की बातें सिद्ध करने में माहिर हैं। लेकिन, उनमें से एक भी वेदों की सच्ची राह बताने वाला नहीं है, बल्कि भटकाने वाले बहुत मिल जाएंगे। आधुनिक विचार रखने वाले दुकानदार लोगों ने धर्म का कबाड़ा कर रखा है। जब तक व्यक्ति वेद, उपनिषद नहीं पढ़ता, तब तक वह हिन्दू धर्म को नहीं समझ सकता। मनुष्य के जीवन में कई पड़ाव आते हैं जो उनके जन्म के साथ ही शुरू होते हैं और मृत्यु तक चलते हैं। हिन्दू धर्म में व्यक्तिगत जीवन में आने वाले हर पड़ाव को परंपरा के साथ अवश्य जोड़ दिया गया है, जिसकी वजह से उनका महत्व और भी बढ़ गया है। इंसानी जीवन में जितने भी चक्र आते हैं उनमें जन्म और मृत्यु शामिल हैं। जब भी घर में कोई बच्चा जन्म लेता है, या फिर परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो पूरे परिवार पर सूतक लग जाता है। जिसे आमतौर पर बिहारी बोलचाल में छुतका लगना कहा जाता है। सूतक यानी छुतका से जुड़े कई विश्वास या अंधविश्वास हमारे समाज में मौजूद हैं। लेकिन, क्या वाकई सूतक एक अंधविश्वास का ही नाम है या इसके पीछे कोई व्यावहारिक या वैज्ञानिक कारण भी है ? जब भी परिवार में किसी का जन्म होता है तो परिवार पर 10 दिनों के लिए सूतक लग जाता है। इस दौरान परिवार का कोई भी सदस्य न तो किसी धार्मिक कार्य में भाग ले सकता है और न ही मंदिर जा सकता है। घर का द्रव्य पदार्थ मंदिर में नहीं चढ़ाया जाता है। उन्हें इन दस दिनों के लिए पूजा-पाठ से दूर रहना होता है। इसके अलावा बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री का रसोईघर में जाना या घर का कोई काम करना तब तक वर्जित होता है जब तक की घर में हवन न हो जाए। प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध रहता है। इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं। अक्सर इसे एक अंधविश्वास मान लिया जाता है, जबकि इसके पीछे छिपे बड़े ही व्यावहारिक कारण की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। ये बात तो सभी जानते ही हैं कि पहले के दौर में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। घर की महिलाओं को हर हालत में पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करना होता था। लेकिन, बच्चा पैदा होने के बाद महिला के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। साथ ही, अन्य रोगों के संक्रमण के दायरे में आने के मौके बढ़ जाते हैं। इसलिए 10-30 दिनों के लिए महिला को बाहरी लोगों से दूरी बना कर रखा जाता है। साथ ही, उन्हें हर संभव आराम की जरूरत होती है जो उस समय संयुक्त परिवार में मिलना मुश्किल हो पाता था। इसलिए सूतक के नाम पर इस दौरान उन्हें आराम दिया जाता था, ताकि वे अपने दर्द और थकान से बाहर निकल पाएं। पारंपरिक तौर पर सूतक का समय भी विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए अलग-अलग माना गया था। जैसे कि ब्राह्मण के लिए यह समय 10 दिन का, वैश्य के लिए 20 दिन, क्षत्रिय के लिए 15 दिन और शूद्र के लिए 30 दिन का होता था। मध्यकालीन युग में शूद्र वर्ण की महिलाओं को शारीरिक कार्य अपेक्षाकृत ज्यादा करना होता था। उच्च वर्ण के लोगों के घर जाकर सफाई, बर्तन आदि सभी कार्य शूद्र वर्ण की महिलाएं ही करती थीं और बच्चे को जन्म देने के बाद उनके शरीर को फिर से तैयार होने के लिए समय लगता था। इसलिए उनके लिए सूतक का समय 30 दिनों का निर्धारित था। लेकिन, बदलते समय में चंद लोगों ने सूतक को एक अंधविश्वासी प्रथा का मसला बना दिया है जो कि खुद महिलाओं के लिए सुरक्षा बाण है और नवजात की जिंदगी के लिए जरुरी भी है।

बिना ठोस कारण के कोई भी नियम नहीं

大富豪国际网址 सूतक का संबंध 'जन्म के' निमित्त से हुई अशुद्धि से है। जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष पाप के प्रायश्चित स्वरूप 'सूतक' माना जाता है। वहीं, यदि वैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो जब बच्चे का जन्म होता है तब उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए 20-30 दिनों तक उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उसे घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता था। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसका मौलिक उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखना है। आज के समय में वे बच्चे जो जन्म के समय काफी कमजोर होते हैं उन्हें डॉक्टर इंक्यूबेटर में रखते हैं ताकि वे बाहरी वातावरण के लिए शारीरिक तौर पर तैयार हो जाएं। लेकिन, हिन्दू धर्म में गर्भ से बाहर निकलते ही बच्चे को वातावरण में ढ़ालने के लिए अनेक तरीके पहले से ही मौजूद रहे हैं। प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों और ज्ञानियों ने बिना किसी ठोस कारण के कोई भी नियम नहीं बनाए। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की जांच और उसे गहराई से समझने के बाद ही दिशा-निर्देश दिए गए, जो बेहद व्यावहारिक हैं। लेकिन, आज के दौर में उनकी व्यावहारिकता को समाप्त कर कुछ लोग उन्हें मात्र एक अंधविश्वास की तरह देखते हैं। घर में किसी शिशु का जन्म या किसी का निधन हो जाता है तब उस परिवार के सदस्यों को सूतक या अशुचि (शुद्धि) की स्थिति में बिताने होते हैं।। धर्म ग्रन्थों में इस स्थिति को सूतक कहा गया है। निर्धारित अवधि के बाद शुद्धि कर्म करने पर वे सहज स्थिति में आते हैं।। शुद्धि के बाद ही परिजन वेदविहित अथवा धार्मिक कृत्यों को सम्पन्न कर सकते हैं। जन्म- मरण के क्रम में स्वाभाविक स्वरूप से क्षेत्र और वातावरण में गन्दगी फैलती है। इससे अशुद्धि की स्थिति बनती है। धार्मिक कृत्य शुद्धि के बाद ही किए जाने चाहिए। वहीं, जन्म- मरण के क्रम में परिजनों के मन सहज स्थिति में नहीं रहते। उनमें राग, शोक, भय आदि का प्रभाव बना रहता है। ऐसी विक्षोभ की अस्त-व्यस्त मानसिकता में धार्मिक प्रयोग सिद्ध नहीं होते।

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मृत्यु के पश्चात परिवार पर लगता है पातक

जिस तरह जन्म के समय परिवार के सदस्यों पर सूतक लग जाता है उसी तरह परिवार के लिए सदस्य की मृत्यु के पश्चात भी सूतक का साया लग जाता है, जिसे ‘पातक’ कहा जाता है। पातक का संबंध 'मरण के' निमित्त से हुई अशुद्धि से है। मरण के अवसर पर दाह संस्कार में जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष पाप के प्रायश्चित स्वरूप 'पातक' माना जाता है। इस समय भी परिवार का कोई सदस्य न तो मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर जा सकता है और न ही किसी धार्मिक कार्य का हिस्सा बन सकता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके परिवार पर पातक लग जाता है। पातक लगने के 13वें दिन क्रिया होनी चाहिए और उस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। इसके पश्चात मृत व्यक्ति की सभी नई-पुरानी वस्तुओं, कपड़ों को गरीब और असहाय व्यक्तियों में बांट देना चाहिए। किसी लंबी और घातक बीमारी, एक्सिडेंट, वृद्धावस्था या अन्य कारण से व्यक्ति की मृत्यु होती है तो इस वजह से संक्रमण फैलने की संभावनाएं बहुत हद तक बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दाह-संस्कार के पश्चात स्नान आवश्यक है, ताकि श्मशान घाट और घर के भीतर मौजूद कीटाणुओं से मुक्ति मिल सके। इसके अलावा उस घर में रहने वाले लोगों को संक्रमण का वाहक माना जाता है, इसलिए 13 दिन के लिए सार्वजनिक स्थानों से दूर रहने की सलाह दी गई है। घर में हवन होने के बाद घर के भीतर का वातावरण शुद्ध हो जाता है, संक्रमण की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं, जिसके बाद ‘पातक’ की अवधि समाप्त होती है। सूतक-पातक का असर केवल किसी इंसान के जन्म पर ही नहीं होता है बल्कि अगर घर में पालतू पशु या जानवर हो तो उनके जन्म और मृत्यु पर भी इसका असर होता है। घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर 1 दिन का सूतक रहता है, जबकि घर से दूर या बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता। बहरहाल, ऐसा नहीं है कि आज के आधुनिक युग में परंपराओं में जकड़ कर रहना जरुरी है। परंपराओं में जकड़ने से अच्छा है कि उसके लाभकारी पक्ष को स्वीकारा जाए और कुरीतियों को पहचान कर उसे छोड़ा जाए। आज आधुनिकता और परंपरा में संतुलन जरूरी है, क्योंकि काल चाहे जो भी हो, परंपराएं हमारे विवेक से ही हैं, न की हम परम्पराओं से हैं।

Edited by Ashutosh

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