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दहेज उत्पीड़न कानून का अक्सर होता है दुरूपयोग

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Posted on: 26 Sep, 2018 Tags  

BiharonWeb: 26 Sep, 2018,

दहेज उत्पीड़न की घटनाओं पर समाज को बदलना होगा नजरिया

बिहार 大富豪国际网址समेत विभिन्न राज्यों में आए दिन समाचार पत्र को खोलते ही बोल्ड हेडिंग में यह समाचार देखने को मिल जाता है- दहेज न देने के कारण नवविवाहिता की हत्या, दहेज़ के लिए ससुराल पक्ष के लोगों ने विवाहिता को पीटा, मारा, जलाया आदि। समाचार पढ़कर और जली हुई युवती की तस्वीर छपी देखकर इंसान की रूह कांप जाती है। मन में बहू के जलने, छटपटाने और मौत के मुंह में समाने का दृश्य साकार हो उठता है। अक्सर दहेज उत्पीड़न या हत्याओं के काण्ड समाचार पत्रों और टेलीविजन पर दिख जाते हैं। शायद ही कोई ऐसा सप्ताह होता है जिसमें दो-चार दहेज हत्याओं, दहेज के कारण आत्महत्या या उत्पीड़न के समाचार टेलीविजन या अखबार में न आते हों। एक हद तो यह सही है कि आज के इस भौतिकतावादी युग में दहेज के प्रति सबका आकर्षण दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है और लोग अपने बेटे की पढ़ाई से लेकर उसकी नौकरी लगने तक का सारा खर्च दहेज के रूप में वसूल कर लेना चाहते हैं। मनमाना दहेज न मिलने पर बेचारी निर्दोष बहू को अमानुषिक यातनायें देते हैं, उसे तंग करते हैं, और इस अत्याचार की पराकाष्ठा तो तब होती है जब इन यातनाओं का परिणाम बहू की आत्महत्या या हत्या के रूप में सामने आता है। विभिन्न अखबारों, न्यूज़ चैनलों आदि पर लगभग प्रतिदिन सैकड़ों समाचार दहेज की समस्या के इर्द-गिर्द आते हैं। दहेज की दिनों-दिन बढ़ती घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि दहेज एक कभी न समाप्त होने वाली समस्या बन चुका है। लेकिन, इस संबंध में एक बात विचार करने लायक है कि जिन घटनाओं को हम दहेज के कारण हुई हत्या या आत्महत्या मान लेते हैं, क्या वह वास्तव में दहेज की वजह से हुई हैं ? जिन घटनाओं को हम दहेज़ उत्पीड़न का नाम दे देते हैं, उनमें कितनी सच्चाई है ? क्या वह मनगढ़ंत तो नहीं है ? शायद, ज्यादातर लोग इस बारे में सोंचने की कभी जरूरत ही नहीं समझते। बस लड़की की मौत ससुराल में अस्वाभाविक ढंग से हुई नहीं कि लोग इसे दहेज हत्या या दहेज उत्पीड़न के परिणामस्वरूप हुई आत्महत्या मान लेते हैं। ऊपर से मीडिया के लोग समाचार को रोचक और धमाकेदार बनाने के चक्कर में नमक-मिर्च लगाकर इस तरह से पेश करते हैं कि लोगों की सारी सहानुभूति स्वाभाविक रूप से पीड़ित लड़की और उसके परिवार की तरफ हो जाती है। जबकि, लड़के वाले चारों ओर से अपराधी साबित हो जाते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस भी छानबीन करने की अधिक तकलीफ न उठाते हुए सीधे ससुराल पक्ष के लोगों को जेल भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। शादी के शुरुआती 3 सालों के भीतर इस प्रकार के अधिक मामले सामने आते हैं।

पारिवारिक व दाम्पत्य जीवन में आपसी सामंजस्य न होना है मुख्य कारण

दहेज के कारण होने वाली उत्पीड़न, हत्याओं या आत्महत्याओं के बारे में यदि गहराई में जाकर छानबीन की जाये तो पता चलेगा कि मामलों में प्रचारित घटनाओं में 70 फीसदी घटनाएं मात्र दहेज के कारण नहीं होती। ऐसे अधिकांश मामलों में दहेज़ उत्पीड़न क़ानून का दुरूपयोग किया गया है। सभी मनुष्य क्रूर और दहेज लोभी तो नहीं होते। इस प्रकार की घटनाओं के पीछे अन्य बहुत से कारण होते हैं, जिन्हें दहेज विरोधी लहर की वजह से अनदेखा कर दिया जाता है। अगर मामलों की तह में जाया जाये तो देखने में आता है कि इस प्रकार की अधिकांश घटनायें दहेज के कारण न होकर पारिवारिक व दाम्पत्य जीवन में आपसी सामंजस्य न होने के कारण होती हैं। आजकल की आधुनिक विचारों वाली ज्यादातर लड़कियां अपने पति के साथ अलग रहने की इच्छुक होतीं हैं और पति के व्यवसाय आदि के कार्य से कहीं बाहर रहने पर वह भी अपने पति के साथ रहने की जिद करतीं हैं। कभी-कभी पति के लिये व्यवसाय में स्थायित्व न होने समेत अन्य कारणों से पत्नी को दूसरे शहर में साथ रखना संभव नहीं होता। परिणामस्वरूप, सास-ससुर, ननद आदि के साथ रह रही बहू की अक्सर इन सबसे तना-तनी हो जाती है। आगे चलकर तना-तनी झगड़े का रूप भी ले लेती है, पास-पड़ोस के लोग इस झगड़े को दहेज के कारण होने वाला झगड़ा ही समझते हैं। ऐसे में यदि किसी प्रकार की घटना हो जाये तो लोग दहेज का मामला ही मान लेते हैं। खासकर तुनकमिजाजी स्वभाव की बहुएं आमतौर पर ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाकर जेल भेजवाने की धमकी भी देती हैं। वहीं, आज के युवाओं को आजाद जीवन पसंद है। युवक-युवतियां एक साथ ही कालेज में पढ़ते, एक ही ऑफिस में कार्य करते हैं। इससे कभी-कभी उनमें प्रेम संबंध भी विकसित हो जाते हैं और यह संबंध अक्सर इतने गहरे हो जाते हैं कि किन्हीं मजबूरियोंवश अन्यन्त्र शादी हो जाने पर भी लोग अपने इन संबंधों को बरकरार रखना चाहते हैं। ऐसे संबंधों से पति-पत्नी के बीच दरार बन जाती है। आये दिन झगड़े होने लगते हैं। कोई भी पति या पत्नी यह कभी पंसद नहीं करता कि उन दोनों के बीच कोई तीसरा आये। ऐसे संबंधों को लोग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करते। लेकिन, जब दोनों के बीच कोई तीसरा आ जाता है तो रोज-रोज झगड़ा-मारपीट होने लगती है और फिर इस रोज-रोज के झगड़े से तंग आकर भावुक होकर लड़की आत्महत्या तक कर लेती है। समाज तुरन्त दहेज हत्या के रूप में इसे प्रचारित कर देता है।

ज्यादातर तुनकमिजाजी बहुएं ही अपनाती हैं आत्महत्या का रास्ता

अक्सर यह भी देखने में आता है कि अपनी लाडली की शादी तय करने के चक्कर में लड़की वाले, लड़के वालों से झूठे वादों के पुल बांध देते हैं। जबकि उन्हें अच्छी तरह मालूम होता कि बाद में इन सब वादों को पूरा करना मुश्किल ही नहीं असंभव है। लेकिन, बेटी की शादी तय करने के चक्कर में वह इस पर ध्यान नहीं देते कि इसका परिणाम बुरा होगा। जब नींव ही खोखली है तो इमारत कैसे टिकेगी ? चार दिनों बाद धराशायी हो जायेगी और होता भी यही है। ससुराल वाले लड़की को उलाहने देते हैं, लेकिन उसे यह उलाहने जान से मारने के लिये हरगिज नहीं दिये जाते, बल्कि उसके परिवार को झूठा बताने के लिये ही दिये जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि वर-वधू की पारिवारिक स्थिति में जमीन-आसमान का अन्तर है। वर तो सोने चांदी की दुकान का मालिक है और वधू के घर में तिलकूट बेची जाती है। अब भला ऐसी स्थिति में दाम्पत्य जीवन कहां तक निभ सकता है। बात-बात में उनमें झगड़ा होता है, कभी खान-पान को लेकर, कभी फैशन को लेकर तो कभी शिष्टाचार को लेकर। बात-बात पर लड़की को टोका जाता है जिससे लड़की को यह महसूस होता है कि वह इस घर के लायक नहीं है। वह अन्दर ही अन्दर घुटने लगती और अधिक परेशान होने पर आत्महत्या का रास्ता चुन लेती है। वहीं, लोग समझते हैं कि गरीब मां-बाप ने दहेज नहीं दिया, इसी कारण बहू को मार डाला गया। यदि इन घटनाओं पर विचार करें तो निष्कर्ष निकलता है कि इन सब घटनाओं में सबसे महत्वपूर्ण कारण होता है लड़कियों की तुनकमिजाजी। जरा सी बात हुई नहीं कि बेसिरपैर की बांते करने लगीं। जरा-जरा सी बात पर बिगड़ने लगीं। अपनी जिद पूरी न होने पर बिना आगे-पीछे सोंचे आत्महत्या कर लेतीं हैं। वहीं, कुछ माता-पिता भी सोंचते हैं कि क्यों न इस अवसर का लाभ उठाया जाये, पुलिस में रिर्पोट लिखाकर दहेज में दिया सामान वापस ले लिया जाये और इसी पैसे से दूसरी लड़की को निपटा दिया जाये।

प्रशासन, मीडिया और समाज को बदलना होगा दृष्टिकोण

एक बात तय है कि अगर लड़कियां जरा सी भी समझदारी से काम लें तो वह निश्चित रूप से अपने आप को ऐसी स्थिति से बचा सकती हैं। जरा-जरा सी बात पर लड़कियों को भावुक नहीं होना चाहिये। अगर स्थिति खराब है तो अदालत में जाना चाहिये, पति या सास-ससुर ठीक रास्ते न आएं तो तलाक भी लिया जा सकता है। सुसराल वालों को भी अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। उन्हें ध्यान रखना होगा कि उनकी पुत्री भी किसी की बहू है, जैसे वे अपनी बहू के साथ करते हैं, वैसा ही व्यवहार उनकी पुत्री को भी ससुराल में मिल सकता है। साथ ही ससुराल में होने वाली हत्याओं, आत्महत्याओं के सम्बंध में प्रशासन, मीडिया और समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। मीडिया को मात्र समाचार को चटपटा बनाने और टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में किसी की इज्जत से खिलवाड़ नहीं करना चाहिये। ध्यान रखें, ऐसी घटनाओं के पीछे एकमात्र दहेज ही नहीं और भी कारण हो सकते हैं। लड़कियों को भी तुनकमिजाजी छोड़नी होगी। जान अनमोल है, आत्महत्या कोई खेल नहीं है। आज औरतें एक से बढ़कर एक ऊचें ओहदों पर हैं, जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है। डरे नहीं, संघर्ष करें।

सास भी होती हैं प्रताड़ित

आमतौर पर माना जाता है कि सास अपनी बहुओं को प्रताड़ित करती है, या उन पर तरह-तरह के जुल्म ढ़ाती है, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि अपनी बहुओं से सास भी प्रताडि़त होती है। सदियों से सास के बारे में प्रचलित है कि उसमें दया, ममता, प्रेम नाम की कोई चीज नहीं होती है या वह किसी जल्लाद से कम नहीं होती। सच तो यह है कि वे मुफ्त में ही बदनाम हैं। आज के समय में बहुओं को सास की आवश्यकता तभी तक है, जब तक कि बच्चे छोटे हैं, ताकि वे उन्हें संभाल सकें। बच्चों के बड़े हो जाने या सास के वृद्ध हो जाने पर उन्हें उनकी आवश्यकता नहीं रहती और यहीं से शुरू होती है सास की उपेक्षा होना। जब तक सास युवा या प्रौढ़ रहती है, तभी तक उसकी चलती है और उसके वृद्ध या विधवा होते ही सत्ता बहुओं के हाथ में आ जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 31 फीसदी बुजुर्ग महिलाएं अपने ही घरों में सताई जा रही हैं। इन्हें सताने के मामले में 23 फीसदी बहुएं जिम्मेदार हैं। 55 फीसदी बुजुर्ग सास अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की शिकायत किसी से नहीं करतीं। शायद ऐसा अपनी इज्जत को बचाए रखने के लिए करती हैं। एक अन्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट कहती है कि बुजुर्ग महिलाएं परिवार की सबसे अवांछित सदस्य मानी जाती हैं, जिनकी परिवार में हैसियत खत्म होती जा रही है। वे लगातार प्रताडऩा का शिकार हो रही हैं और इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि इनमें ज्यादातर अशिक्षित या कम शिक्षित हैं। इनके पास संपत्ति या खुद का पैसा नहीं है और किसी तरह के रोजगार से भी जुड़ी नहीं हैं। ऐसे में वे अपने घर की चारदीवारी में ही सिमटी हुई हैं। जिस सास की एक से अधिक बहुएं होती हैं, उनकी बहुत फजीहत होती है, क्योंकि सभी बहुएं बूढ़ी सास का भार एक-दूसरे पर डालने का प्रयास करती हैं। कैसी विडंबना है कि चार-चार बहुओं के होते हुए भी कोई बूढ़ी सास को सहर्ष स्वीकार कर अपने साथ रखने को तैयार नहीं होती। वृद्धावस्था उस समय असहनीय हो जाती है जब अपनी ही बहुएं उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करती हैं और बात-बात पर ताने और झिड़कियां सुनाने लगती हैं। सास की इतनी दुर्दशा है कि उन्हें छोटी-छोटी चीजों के लिए भी अपनी बहुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार बहुएं अपनी सास को झिड़क देती हैं और बेचारी सास अपमान चुपचाप सहन करती चली जाती हैं। बूढ़ी सास को बार-बार प्रताडि़त किया जाता है और उनसे ऐसे काम लिए जाते हैं जो उनके सम्मान के खिलाफ है।

घरेलू हिंसा का कानून सास-बहू दोनों के लिए समान

大富豪国际网址 बदलते समय और बिखरते संयुक्त परिवार के साथ सासबहू के रिश्तों में भी काफी परिवर्तन आया है। एकल परिवार की वृद्धि होने के कारण लड़कियां प्रारंभ से ही सासविहीन ससुराल की ही अपेक्षा करती हैं। वे पति व बच्चे तो चाहती हैं, लेकिन पति से संबंधित अन्य कोई रिश्ता उन्हें मंजूर नहीं होता। शायद वे यह भूल जाती हैं कि आज यदि वे बहू हैं तो कल वे सास भी बनेंगी। बहू द्वारा सास को प्रताड़ित करना कोई अप्रत्यक्षित घटना नहीं रह गई। इस मामले में सास भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है, क्योंकि घरेलू हिंसा का जो कानून बहू के लिए है वही सास के लिए भी है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक अंग्रेजी अखबार के जरिए यह कहा था कि घरेलू हिंसा कानून ऐसा होना चाहिए जो बहू के साथ-साथ सास को भी सुरक्षा प्रदान कर सके। क्योंकि, अब बहुओं द्वारा सास को सताने के भी बहुत मामले आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू मैरिज कानून के मुताबिक, कोई भी बहू किसी भी बेटे को उस के मां-बाप के दायित्वों के निर्वहन से मना नहीं कर सकती। सास-बहू के बीच झगड़े होना आम बात है, लेकिन जब सास अपनी बहू के क्रियाकलापों से खुद को असुरक्षित व मानसिक रूप से दबाव महसूस करे तो इस रिश्ते से अलग हो जाना ही उचित है। आज की स्थिति देख कर तो यही लगता है कि अब हम सब को अपनी वृद्धावस्था के लिए पहले से ही ठोस उपाय कर लेने चाहिए। कई यूरोपियन देशों में तो व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद शोक मनाने के लिए भी सारे इंतजाम करने के बाद ही मरता है। हमारे समाज का तो ढांचा ही कुछ ऐसा है कि हम अपने बच्चों से बहुत सारी अपेक्षाएं रखते हैं।

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सास के लिए इन बातों का ध्यान रखना जरुरी

大富豪国际网址 भारतीय समाज में एक औरत के लिए सास बनना किसी पदवी से कम नहीं होता। महिला को लगता है कि अब तक उस ने बहू बन कर काफी दुख झेले हैं और अब तो वह सास बन गई है, सो अब उस के आराम करने के दिन हैं। सास की हमउम्र सहेलियां भी बहू के आते ही उस के कान भरने शुरू कर देती हैं, जैसे- बहू को थोड़ा कंट्रोल में रखो, अभी से छूट दोगी तो पछताओगी बाद में, उसे घर के रीतिरिवाज अच्छे से समझा देना और उसी के मुताबिक चलने को कहना, अब तो तुम्हारा बेटा गया तुम्हारे हाथ से आदि जुमले अकसर सुनने को मिलते हैं। ऐसे में नई-नई सास बनी एक औरत असुरक्षा की भावना से घिर जाती है और बहू को अपना प्रतिद्वंद्वी समझ बैठती है। जबकि, सही मायने में देखा जाए तो सास-बहू का रिश्ता मां-बेटी जैसा होता है। आप चाहें तो गुरु और शिष्या की तरह भी हो सकती हैं और सहेलियों जैसी भी। नई बहू के साथ घर के बाकी सदस्यों के जैसा ही व्यवहार करना चाहिए। उस से प्यार भी करें और उस पर विश्वास भी, लेकिन न तो चौबीसों घंटे उस पर निगरानी रखें और न ही उस की बातों पर अंधविश्वास करें। अच्छा होगा कि आप पहले बहू को ससुराल में घुलमिल जाने दें और उस के मन में ससुराल के प्रति लगाव पैदा होने दें। बेटे-बहू को स्पेस दें, उन के आपसी झगड़ों में बिना मांगे अपनी सलाह न दें, परंपराओं के नाम पर जबरदस्ती के रीतिरिवाज अपनी बहू पर न थोपें, उस के विचारों का भी सम्मान करें, बहू की गलतियों पर न तो उस का मजाक उड़ाएं और न ही उस के मायके वालों को कोसें, बल्कि, अपने अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए सही-गलत, उचितअनुचित का ज्ञान दें। लेकिन, याद रहे कि ‘हमारे जमाने में…’ वाला जुमला न इस्तेमाल करें, बहू की गलतियों के लिए बेटे को ताना न दें, वरना बहू तो आप से चिढ़ेगी ही, बेटा भी आप से दूर हो जाए। यदि आप को अपनी बहू का व्यवहार अप्रत्याशित रूप से खतरनाक महसूस हो रहा है तो आप अदालत का दरवाजा खटखटाने में संकोच न करें। याद रखिए घरेलू हिंसा का जो कानून बहू के लिए है वह सास के लिए भी है।

अच्छी तालमेल हो तो खुशियों से भर सकता है घर

大富豪国际网址 भारतीय समाज के लोगों ने अपने मन में सास-बहू के रिश्ते को ले कर काफी पूर्वाग्रह पाल रखे हैं। विशेषकर युवा पीढ़ी बहू को हमेशा बेचारी व सास को दोषी मानती है। युवतियां भी शादी से पहले से ही सास-बहू के रिश्ते के प्रति गलतफहमियों से भरी होती हैं। वे ससुराल में जाते ही सबकुछ अपने तरीके से करने की जिद में लग जाती हैं। वे पति को मम्माज बॉय कह कर ताने देती हैं और सास को भी अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश करती हैं। शादी के बाद पति ही नहीं, बल्कि ससुराल के बाकी सदस्यों के साथ भी अच्छा रिश्ता होना बहुत जरूरी है। बहू के लिए अपने पार्टनर के बाद सबसे ज्यादा जरूरी होता है सास को समझना, क्योंकि उन्हीं के साथ लड़की को सारा दिन बिताना होता है। इसके अलावा अगर सास-बहू में अच्छी तालमेल हो तो घर खुशियों से भर जाता है।

नोट大富豪国际网址: यह लेख इस बात का हरगिज समर्थन नहीं करता है कि दहेज़ के लिए बहुओं को प्रताड़ित नहीं किया जाता है, बल्कि इस लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि दहेज़ उत्पीड़न क़ानून का अधिक से अधिक दुरूपयोग भी किया जा रहा है।

Edited by Ashutosh & Pushpanjali

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