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फर्ज-ए-कुर्बानी का त्योहार है बकरीद

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Posted on: 22 Aug, 2018 Tags  

BiharonWeb: 22 Aug, 2018,

खुदा के हुक्म पर बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना ही बकरीद मनाने का उद्देश्य

इस्लाम धर्मावलम्बियों के फर्ज-ए-कुर्बानी का पवित्र त्योहार ईद-उल-अजहा (बकरीद) पूरे बिहार में धूमधाम से मनाया जा रहा है। राजधानी पटना समेत राज्य के विभिन्न ईदगाहों, खानकाहों और मस्जिदों में बकरीद की नमाज अता की गई। राज्य के विभिन्न जिलों में भी शांति और सद्भावना के साथ बकरीद की नमाज अता की गई। पटना के गांधी मैदान में बकरीद की नमाज सुबह 8 बजे अता की गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बकरीद के अवसर पर देश और प्रदेशवासियों को शुभकामनायें सहित बधाई दी हैं। कहा कि ईद-उल-अजहा का त्योहार असीम आस्था और विश्वास का त्योहार है। खुदा के हुक्म पर बड़ी से बड़ी कुर्बानी दिये जाने के लिये भी तैयार रहना इस त्योहार का उद्देश्य है। यह त्योहार कुर्बानी के महत्व को दर्शाता है। साथ ही मुख्यमंत्री ने इस त्योहार को मेलजोल, भाईचारा व सद्भाव के साथ मनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि त्योहारों का आनंद आपसी भाईचारा और मेलजोल के साथ मनाने से बढ़ता है और इसकी सच्ची ख़ुशी मिलती है। बिहार राज्य हज समिति के कार्यकारी मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी रशीद अहमद ने बताया है कि ईद-उल-अजहा के नमाज का आयोजन गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी हज भवन में किया गया है। वहीं, जहानाबाद में नमाज अता करने के बाद सभी ने एक-दूसरे से गले मिलकर बधाई दी। मधुबनी में भी बड़ी ईदगाह में नमाज अता की गई। इधर बेतिया के मैनाटांड़ में बकरीद के मौके पर सूबे के गन्ना उद्योग व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद ने सबके साथ मिलकर नमाज अता की। वहीं,बेतिया के ही नरकटियागंज में भी बकरीद के मौके पर लोगों ने नमाज अता की और एक दूसरे को बधाई दी। 22 अगस्त की सुबह से ही पुलिस-प्रशासन विभिन्न जगहों पर तैनात हैं और सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था की गई है।

सोशल मीडिया पर फैलाई अफवाह तो होगी कार्रवाई

, नेपाल बांग्लादेश की सीमा से सटे अल्पसंख्यक बहुल किशनगंज जिले को अति संवेदनशील मानकर पुलिस-प्रशासन को सतर्क किया गया है। हाल के दिनों में घटित घटनाओं से सबक लेकर वहां 21-23 अगस्त तक पुलिस बल को मुस्तैद किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय व अंतर्राज्यीय सीमा से सटे होने के कारण यहां आतंकी घुसपैठ की आशंका बानी रहती है। खासकर पिछले वर्षों में हुई लगभग एक दर्जन घटनाओं से सबक लेते हुए यहां चौकसी बढ़ाई गई है। वहीं, प्रशासन को अंदेशा है बकरीद के दौरान शरारती व कट्टरपंथी तत्वों द्वारा अफवाह फैलाकर जिले की शांति भंग की जा सकती है। इसके मद्देनजर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी अफवाह फैलाने वालों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड सहित 200 से अधिक संवेदनशील स्थानों पर पुलिस के 500 जवानों व अधिकारियों की तैनाती की गई है। दंगा निरोधी बल व रैपिड एक्शन फोर्स के अलावा दरभंगा जोन के विभिन्न जिलों से भी अतिरिक्त पुलिस बल मंगाए गए हैं। इन्हें आपात स्थित के लिए रिजर्व में रखा गया है। तीन दिनों तक पुलिस-प्रशासन बिल्कुल अलर्ट रहेगी। शांति-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर डीएम-एसपी के नेतृत्व में लगातार फ्लैग मार्च किया जा रहा है। प्रायः तीन दिनों तक चलने वाले बकरीद पर्व को लेकर सतर्कता बरती गई है। पड़ोसी राज्य बंगाल, नेपाल व बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे होने के कारण जिले की निगरानी बढ़ा दी गई है। संवेदनशील स्थानों को चिह्नित कर सशस्त्र पुलिस बल तैनात की गई है। एसएसबी व बीएसएफ से समन्वय बनाकर सीमावर्ती इलाकों पर विशेष नजर रखी जा रही है।

इस्लाम में कुर्बानी का महत्व

इस्लाम में कुर्बानी का काफी महत्व है। कुरान में कई जगह जिक्र किया गया है कि अल्लाह ने करीब 3 दिनों तक हजरत इब्राहिम को ख्वाब के जरिए अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म दिया था। हजरत इब्राहिम को सबसे प्यारे उनके बेटे हजरत ईस्माइल थे।
हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे हजरत ईस्माइल को बताया कि अल्लाह ने उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया है और उनके लिए सबसे प्यारे और अजीज उनके बेटे ही हैं। हजरत इब्राहिम की ये बात सुनकर हजरत ईस्माइल ने अल्लाह के हुक्म का पालन करने को कहा और अपने वालिद (पिता) के हाथों कुर्बान होने के लिए राजी हो गए। उस समय हजरत ईस्माइल की उम्र महज 13 या 14 साल की थी। कहा जाता है कि हजरत इब्राहिम को 80 साल की उम्र में औलाद नसीब हुई थी। हजरत इब्राहिम के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देना एक बड़ी परीक्षा थी। जिसमें एक तरफ अल्लाह का हुक्म था तो दूसरी तरफ बेटे की मुहब्बत। लेकिन हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत ईस्माइल ने अल्लाह के हुक्म को चुना। बेटे को कुर्बान करना हजरत इब्राहिम के लिए आसान नहीं था। बेटे को कुर्बान करते समय उनकी भावनाएं कहीं आड़े ना आ जाए, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधी और बेटे पर छुरा चलाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन जैसे ही उन्होंने बेटे पर छुरा चलाया तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह दुंबा ( एक जानवर) भेज दिया और हजरत ईस्माइल की जगह दुंबा कुर्बान हो गया। तभी से हर हैसियतमंद मुसलमान पर कुर्बानी वाजिब हो गई। इस्लाम धर्म में माना जाता है कि अल्लाह ने जो पैगाम हजरत इब्राहिम को दिया वो सिर्फ उनकी परीक्षा के लिए था। ताकि ये संदेश दिया जा सके कि अल्लाह के फरमान के लिए मुसलमान अपना सब कुछ कुर्बान कर सकते हैं। जो शख्स हैसियतमंद होते हुए भी अल्लाह की रजा में कुर्बानी नहीं करता है वो गुनाहगारों में शुमार है।

(फाइल फोटो)

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कुर्बानी के गोश्त के होते हैं तीन हिस्से

大富豪国际网址 कुर्बानी के लिए होने वाले जानवरों पर अलग-अलग हिस्से हैं। जहां बड़े जानवर ( भैंस ) पर सात हिस्से होते हैं तो वहीं बकरे जैसे छोटे जानवरों पर महज एक हिस्सा होता है। स्पष्ट है कि अगर कोई शख्स भैंस या ऊंट की कुर्बानी कराता है तो उसमें सात लोगों को शामिल किया जा सकता है। जबकि बकरे की कुर्बानी कराता है तो वो सिर्फ एक शख्स के नाम पर होता है। इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से होते हैं। जिसमें एक हिस्सा गरीबों के लिए होता है। दूसरा हिस्सा दोस्त और रिश्तेदारों में तकसीम किया जाता है। वहीं, तीसरा हिस्सा अपने घर के लिए होता है। कुछ लोग सभी हिस्से गरीबों में दान कर देते हैं। इस्लाम में ऐसे जानवरों की कुर्बानी ही जायज मानी जाती है जो जानवर सेहतमंद होते हैं। अगर जानवर को किसी भी तरह की कोई बीमारी या तकलीफ हो तो अल्लाह ऐसे जानवर की कुर्बानी से राजी नहीं होता है।

Edited by Ashutosh

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